राजेंद्र राठौर@जांजगीर. जिले के मालखरौदा क्षेत्र में कुछ किसानों द्वारा इजराइल की मल्चिंग पद्धति से खेती की जा रही है। बताया जा रहा है कि इससे पानी की बर्बादी नहीं होगी। संबंधित किसानों का कहना है कि इजराइल की मल्चिंग पद्धति से खेती करके पानी की बर्बादी नहीं करने का संदेश दिया जा रहा है।
दरअसल, जिला जल अभावग्रस्त घोषित हुआ है। ज्यादा पानी की सोखने वाली फसल पर रोक लगा दी गई है। ऐसे में किसानों ने पानी की बर्बादी नहीं करने का संदेश दिया है। पानी की एक-एक का सदुपयोग करने किसानों ने इजराइल की मल्चिंग पद्धति से खेती शुरू कर दी है। जिले के मालखरौदा क्षेत्र में कई किसानों द्वारा सब्जी और अन्य फसलों की खेती जा रही है। पानी की समस्या को ध्यान में रखते हुए अधिकांश किसानों ने इजराइल की मल्चिंग पद्धति को अपनाया है। क्षेत्र के कुछ किसानों ने बताया कि उन्होंने अपने खेतों में प्लॉस्टिक कवर की परत बिछाई है, जिसमें पानी जमा रहता है। इसी पानी का उपयोग साग-सब्जी तथा अन्य फसलों की सिंचाई के लिए किया जा रहा है। इससे पानी की बर्बादी नहीं होती।
यह है मल्चिंग सिंचाई पद्धति
उद्यानिकी विभाग के अधिकारियों ने बताया कि मल्चिंग सिंचाई सिस्टम में 30 माइक्रॉन मोटाई का प्लॉस्टिक कवर प्रत्येक पौधों पर चढ़ाया जाता है। यह कवर ऊपर से चांदी सा सुनहरे एवं नीचे से काले रंग का रहता है। कवर के नीचे ड्रिप से पानी पहुंचाया जाता है। मल्चिंग पद्धति में पौधों में नमी बनी रहती है। पानी का वाष्पीकरण भी नहीं होता। पौधे को मिलने वाली नमी से उसका पोषण होता है। खरपतवार भी नहीं लगती।
पानी की आवश्यकता कम
किसानों ने बताया कि करेला और टमाटर की फसल की सिंचाई के लिए गर्मी में प्रति पौधा करेले में 10 लीटर और टमाटर में 15 लीटर पानी लगता था। मल्चिंग सिंचाई पद्धति से करेले में 4 और टमाटर में 10 लीटर पानी से भी काम चल जाता है। फसल भी अच्छी रहने के साथ उत्पादन भी ज्यादा होता है। इसमें पांच लीटर पानी प्रति पौधों में बचत होती है। इसकी लागत 35 हजार रुपए प्रति हेक्टेयर आती है। एक फसल में 70 हजार से ऊपर का लाभ मिल जाता है।

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