शुक्रवार, 5 मई 2017

सफाई के अभाव में मवेशी धोने के काम आ रहे तालाब, शहर में लगातार गहराता जा रहा जलसंकट, प्रशासन उदासीन

जांजगीर-चांपा. जिला मुख्यालय जांजगीर सहित आसपास के क्षेत्र में पिछले कुछ सालों से लगातार जलसंकट गहराता जा रहा है। इससे यह यकीन करना मुश्किल है कि शहर में करीब दर्जन भर तालाब भी है, जो कभी बड़ी आबादी के लिए निस्तारी का साधना होते थे, लेकिन साफ-सफाई के अभाव तथा प्रशासन की उदासीनता के कारण लोग उन तालाबों का इस्तेमाल करना बंद करने लगे हैं। शहर के ज्यादातर तालाब केवल मवेशी धोने के काम आ रहे हैं।

नगरपालिका परिषद जांजगीर-नैला ने पिछले कुछ वर्षों में शहर के तालाबों के सौंदर्यीकरण व पचरीकरण के नाम पर करोड़ों रुपए खर्च दिया है। इसके बावजूद, इन तालाबों का इस्तेमाल निस्तारी के लिए नहीं हो पा रहा है। कारण, पानी में जमी गंदगी व इस्तेमाल से होने वाली बीमारियां है। इनमें शहर का ऐतिहासिक भीमा तालाब, रानी तालाब, बोंगा तालाब, जूना तालाब सहित आधा दर्जन से ज्यादा तालाब शामिल हैं। पहले इन हिस्सों की बड़ी आबादी निस्तारी के लिए इन तालाबों का उपयोग करते थे, लेकिन वर्तमान में इसके पानी से सडऩ व गंदगी की बू आने की बात कहकर लोगों ने इस्तेमाल छोड़ दिया है। तालाब की जगह लोग नल के पानी व टैंकरों से हो रही सप्लाई को ही नहाने से लेकर कपड़े धोने व अन्य जरूरत के लिए उपयोग कर रहे हैं। अगर समय-समय पर तालाबों की सफाई कराई जाती तो ये स्रोत आज भी बड़ी जनसंख्या को राहत दे सकती थी।

रिचार्ज होता वाटर लेवल

तालाबों का मेंटनेंस अगर समय-समय पर होता तो भूजल भी रिचार्ज होता रहता, लेकिन अनदेखी में इन तालाबों का भराव क्षमता भी कम हो रहा है। यही कारण है कि तालाब की मौजूदगी के बाद भी आसपास के इलाकों में भूजल का स्तर गिरता जा रहा है। तालाबों को पानी रिचार्ज का सबसे बड़ा साधन भी माना जाता है।

लगातार घट रहा रकबा

इन तालाबों के आसपास रहने वाले बुजुर्गों के मुताबिक कभी इनका क्षेत्रफल अधिक हुआ करता था, लेकिन लगातार हो रहे निर्माण कार्य और बसावट के चलते रकबा घटता जा रहा है। लोग कचरा फेंकने के लिए भी तालाब के आसपास के हिस्सों का ही इस्तेमाल कर रहे है। यह भी बड़ा कारण है कि तालाबों का अस्तित्व खत्म होता जा रहा है।

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