शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

प्रचार-प्रसार के अभाव में दम तोड़ रही स्थायी लोक अदालत, जानकारी के अभाव में पक्षकारों को नहीं मिल रहा किसी तरह का लाभ

नवीन कदम ब्यूरो@जांजगीर-चांपा. आम जनता से जुड़े समस्याओं के समाधान के लिए जिला न्यायालय में स्थायी लोक अदालत की खंडपीठ तो गठित की गई है, लेकिन जिला विधिक सेवा प्राधिकरण की सचिव द्वारा इसका प्रचार-प्रसार ही नहीं किया जा रहा है। इस वजह से जिले में स्थायी लोक अदालत दम तोड़ रही है, जबकि राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण ने स्थायी लोक अदालत के संबंध में व्यापक प्रचार-प्रसार कर जरूरतमंदों का इस अदालत का लाभ दिलाने का फरमान जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को जारी किया है।

दरअसल, आमतौर पर अदालतों को लेकर आमजन में यह भ्रांति बैठ गई है कि कानूनी पचड़े में पड़े तो सालों बर्बाद हो जाएंगे और राहत कुछ मिलनी नहीं है। यही सोचकर लोग अपने अधिकारों पर चोट होने के बावजूद सब कुछ सहते हुए अदालतों का रुख नहीं करते हैं, लेकिन पिछले कुछ समय से वैकल्पिक विवाद निस्तारण की प्रक्रिया को जिस प्रभावी तरीके से लागू किया गया है, उसने अदालतों के प्रति बने मिथक को तोडऩे में बड़ी भूमिका निभाई है। इसी का एक भाग स्थायी लोक अदालत भी है। राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण नई दिल्ली के निर्देश पर जिला न्यायालय में स्थायी लोक अदालत की खंडपीठ स्थापित की गई है, जो प्रत्येक माह तीन बार लगती है, लेकिन इस अदालत के संबंध में जिला विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा किसी तरह का प्रचार-प्रसार नहीं किया जा रहा है। इस वजह से लोग इस अदालत से आज भी अंजान हैं। यहां बताना लाजिमी होगा कि राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के तत्कालीन सचिव रजनीश श्रीवास्तव कुछ माह पहले जिला प्रवास पर पहुंचे थे। इस दौरान उन्होंने जिला न्यायालय परिसर में आयोजित प्रेसवार्ता में लोक अदालत के साथ ही स्थायी लोक अदालत के संबंध में विस्तृत जानकारी देते हुए इसके फायदे गिनाए थे। प्राधिकरण के तत्कालीन राज्य सचिव श्रीवास्तव के मुताबिक, यह आदालत वास्तव में जनोपयोगी है, जिसकी जानकारी होने से बुनियादी समस्याओं के साथ ही जनहित से जुड़े मुद्दों का समाधान नहीं होने से परेशान लोग इस अदालत में याचिका दायर कर बिना किसी शुल्क के स्थायी समाधान प्राप्त कर सकते हैं, लेकिन प्राधिकरण की जिला सचिव ने अपने उच्चाधिकारी की बातों को एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल दिया है। संभवत: यही वजह है कि जिला विधिक सेवा प्राधिकरण की सचिव द्वारा केवल राष्ट्रीय लोक अदालत पर ही ध्यान दिया जा रहा है। नतीजतन, जिले के लोग स्थायी लोक अदालत से आज भी अनभिज्ञ हैं।
 

स्थायी लोक अदालत के फायदे

स्थायी लोक अदालत द्वारा गुणावगुण या दोनों पक्षों की सहमति से किया गया प्रत्येक निर्णय अंतिम होता है और इसके सभी पक्षकारों पर बाध्य होता है। यानी इसके खिलाफ  अपील नहीं की जा सकती है। स्थायी लोक अदालत द्वारा किया गया प्रत्येक निर्णय सिविल न्यायालय की डिक्री समझा जाता है और इसे किसी भी मूल वाद, आवेदन और निष्पादन कार्रवाइयों में प्रश्नगत नहीं किया जा सकता है। स्थायी लोक अदालत अपने द्वारा किए गए निर्णय की पालना व निष्पादन के लिए क्षेत्रीय अधिकारिता रखने वाले न्यायालय को भिजवा सकती है और जिस न्यायालय को भिजवाया जाएगा, वह उस निर्णय या आदेश की पालना उसी तरह करेगा, जैसे स्वयं द्वारा पारित निर्णय एवं डिक्री की करवाता है। स्थायी लोक अदालत में दायर की जाने वाली अर्जी पर कोई शुल्क व कोर्ट फीस नहीं लगती है। स्थायी लोक अदालत में किसी विवाद के संबंध में अर्जी पेश किए जाने के बाद उसी विवाद को लेकर नियमित न्यायालय में कार्रवाई नहीं की जा सकती है। स्थायी लोक अदालत की प्रक्रिया सरल, सस्ती और शीघ्र न्याय प्रदान करने वाली है, लेकिन इस अदालत की जानकारी नहीं होने से जिले के लोग इसका लाभ नहीं उठा पा रहे हैं।
 

ये हैं जन उपयोगी सेवाएं

0 परिवहन सेवा जिसमें वायु, सडक़ और जल मार्ग से यात्रियों एवं माल ले जाने की सेवा शामिल है।
0 डाक और दूरभाष सेवा।
0 बिजली और जलापूर्ति सेवा।
0 सार्वजनिक स्वच्छता संबंधी सेवा।
0 अस्पताल या औषधालय की सेवा।
0 बीमा सेवाएं, इसमें जीवन बीमा और सामान्य बीमा दोनों शामिल हैं।
0 बैंककारी और वित्तीय सेवा संबंधी सेवाएं।
0 आवासीय सेवा।
0 लिक्वीफाइड पेट्रोलियम गैस संबंधी सेवा। इन सभी लोक व जन उपयोगी सेवाओं संबंधी कोई भी विवाद होने पर स्थायी लोक अदालत में कोई व्यक्ति अथवा संस्था याचिका दायर कर सकती है।
 

यह है याचिका दायर करने की प्रक्रिया

कोई भी व्यक्ति जन उपयोगी सेवाओं को लेकर हुए विवाद के निपटारे के लिए व्यक्तिगत रूप से स्थायी लोक अदालत के समक्ष सादा प्रार्थना पत्र दे सकता है। इसमें विवाद के संबंध में आवश्यक विवरण सहित प्रार्थी व अप्रार्थी पक्ष का संपूर्ण विवरण देना होगा। इसके बाद स्थायी लोक अदालत के अध्यक्ष व सदस्य इस पर सुनवाई करते हैं। इस दौरान अदालत के पास दो विकल्प होते हैं, पहले विकल्प के तहत पक्षकारों में सुलह व बातचीत के जरिए विवाद का सौहाद्र्रपूर्ण तरीके से निपटारा तथा दूसरा विकल्प सुलह से निपटारा नहीं होने पर विवाद का गुणावगुण दोनों पक्षकारों के जवाब और दस्तावेजों सहित अन्य उपलब्ध सामग्री के आधार पर फैसला पारित करना है।
 

इन मामलों में नहीं हो सकती कार्रवाई

0 न्यायालयों में पहले से चल रहे व विचाराधीन प्रकरणों में।
0 किसी भी कानून व विधि के तहत ऐसे अपराध, जिनमें राजीनामा नहीं हो सकता है।
0 जहां विवाद में संपत्ति का मूल्य एक करोड़ रुपए से अधिक हो।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें