शनिवार, 4 मार्च 2017

हे राम! मिनरल वाटर बताकर पिला रहे साधारण पानी

मिनरल वॉटर के नाम पर मची लूट, आईएसआई मार्का बिना चल रहा कारोबार

जांजगीर-चांपा. जिले में मिनरल वॉटर के नाम पर संरक्षित ठंडा पानी का कारोबार खुलेआम चल रहा है। बिना आईएसआई मार्का लिए किए जाने वाले इस लाखों के कारोबार में जहां जनता ठगी जा रही है, वहीं अमानक पानी से लोगों के स्वास्थ्य के साथ भी खिलवाड़ किया जा रहा है। जिले में गर्मी के दिनों में मिनरल वॉटर, पानी पाउच के नाम पर लाखों रुपए का प्रतिमाह व्यापार होता है। इस व्यापार में अपनी हिस्सेदारी के लिए देशी तथा बाहरी दोनों तरह के वाटर शोधक कंपनियां होड़ लगाती हैं। जहां आईएसआई लेकर महंगे प्लांट लगाकर ये कंपनियां बाजार में उतरती हैं। वहीं संरक्षण के नाम से छोटे व्यवसायियों ने भी अपना जुगाड़ बनाया हुआ है और केवल साफ  पानी को ठंडा कर लोगों को मिनरल वॉटर का धोखा दे रही है।

जांच की कोई व्यवस्था नहीं

कभी-कभी तो यह देखने में आया है कि ठंडा मशीन रखकर कंपनी के कर्मचारी शादियों में कुएं का पानी भर देते हैं और लोगों को बेमतलब का स्टेटस बताते हैं। जबकि नामी कंपनियां अपने पानी को बाकायदा लेब में मेंटेन कर फिर ठंडा कर सील पैक करती हैं। इस भर्राशाही में परेशान कंपनियों ने अब 20 लीटर के सिगमेंट में अपना माल बनाना बंद कर दिया है। ठंडा केन वाला पानी कितना शुद्ध है इसकी देखरेख की कोई ठोस व्यवस्था अभी तक प्रशासन नहीं कर पाया है।

व्यापार में 70 प्रतिशत हिस्सा

सरंक्षित ठंडा के नाम पर इन दिनों बोतल बंद पानी व्यवसाय को 70 फीसदी हट चुका है। संरक्षित ठंडा पानी शादी, पार्टियों में तथा दुकानों-आफिसों में बहुतायत से सप्लाई की जाती है। लोग शादियों में ठंडा करने की मशीन लगाकर जार को उल्टा लगाकर रखते हैं। उसी तरह हर दुकानों में प्रतिदिन लगने वाले पानी की पूर्ति इन्हीं ठंडा पानी के जारों से की जाती है। यह पूरा व्यवसाय बोतल बंद पानी का 70 फीसदी हिस्सा अनुमानित है। यह पानी प्रति जार महीने में 700 से 900 रुपए तक बिकता है।

गुजरना पड़ता है टेस्ट से

पानी व्यवसाय के लिए आईएसआई का मार्का लेना अनिवार्य होता है। पानी लोगों के स्वास्थ्य पर सीधे असर करता है। इसके लिए आईएसआई के तहत बीआईएस नियमों के तहत पानी को लेबोरेटरी में 40 पैरामीटर के टेस्ट से गुजरना पड़ता है। पर इसके मापदंडों को पूरा नहीं किया जा रहा है। इसलिए इसमें मैन्यूफेक्चरिंग डेट नहीं डालते हैं। इस खेल में खाद्य विभाग के अधिकारियों की भूमिका से भी इनकार नहीं किया जा सकता है।

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