जांजगीर. क्राइम फ्री इंडिया फोर्स आरटीआई प्रकोष्ठ के पदाधिकारियों द्वारा मंगलवार को गणमान्य नागरिकों की मौजूदगी में नेताजी सुभाषचंद्र बोस की जयंती मनाई गई। इस दौरान जिले के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. आरडी गुप्ता विशेष रूप से उपस्थित थे। कार्यक्रम की शुरूआत वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. गुप्ता ने नेताजी सुभाषचंद्र बोस के तैल्यचित्र के समक्ष धूप-दीप प्रज्जवलित कर किया। इसके बाद संगठन के प्रदेश पदाधिकारी पं. राघवेन्द्र पाठक ने नेताजी की पूजा-अर्चना की।

इसी कड़ी में नगरपालिका परिषद जांजगीर-नैला के इंजीनियर लालू बैस, भाजयुमो पदाधिकारी अनुराग तिवारी, पत्रकार लखनलाल चंद्रा, देवकुमार पाण्डेय, राजेन्द्र राठौर, राजू गोस्वामी, शिव कहरा आदि ने भी नेताजी के छायाचित्र के समक्ष पुष्प अर्पित कर आशीर्वाद प्राप्त किया। इस दौरान वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. गुप्ता ने कहा कि नेताजी की बातें आज भी किसी के भी तन-मन में जोश भर सकती हैं। उन्होंने बताया कि नेताजी सुभाषचंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को ओडिशा (तब के उड़ीसा) के कटक में हुआ था।
पं. राघवेन्द्र पाठक ने कहा कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के अहिंसा के विचारों से सुभाषचंद्र बोस सहमत नहीं थे। ‘नेताजी’ के नाम से मशहूर सुभाषचंद्र बोस ने भारत को आजादी दिलाने के मकसद से 21 अक्टूबर 1943 को आजाद हिंद सरकार की स्थापना की और आजाद हिंद फौज का गठन किया। उन्होंने आगे कहा कि नेताजी अपनी आजाद हिंद फौज के साथ 4 जुलाई 1944 को बर्मा पहुंचे। यहीं पर उन्होंने अपना प्रसिद्ध नारा ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ दिया। सुभाषचंद्र बोस के विचार बहुत क्रांतिकारी थे और उनकी बातें आज भी किसी के भी तन-मन में जोश भर सकती हैं।
पत्रकार लखनलाल चंद्रा ने कहा कि नेताजी के नाम से प्रसिद्ध सुभाषचन्द्र ने सशक्त क्रान्ति द्वारा भारत को स्वतंत्र कराने के उद्देश्य से 21 अक्टूबर 1943 को आजाद हिन्द सरकार की स्थापना की तथा आजाद हिन्द फौज का गठन किया। इस संगठन के प्रतीक चिह्न पर एक झंडे पर दहाड़ते हुए बाघ का चित्र बना होता था। उन्होंने आगे कहा कि 18 अगस्त 1945 को टोक्यो जाते समय ताइवान के पास नेताजी का एक हवाई दुर्घटना में निधन हुआ बताया जाता है, लेकिन उनका शव नहीं मिल पाया।
पत्रकार देवकुमार पाण्डेय ने कहा कि नेताजी की प्रारंभिक पढ़ाई कटक के रेवेंशॉव कॉलेजिएट स्कूल में हुई। इसके बाद उनकी शिक्षा कलकत्ता के प्रेजिडेंसी कॉलेज और स्कॉटिश चर्च कॉलेज से हुई और बाद में भारतीय प्रशासनिक सेवा की तैयारी के लिए उनके माता-पिता ने नेताजी को इंग्लैंड के केंब्रिज विश्वविद्यालय भेज दिया। अंग्रेजी शासनकाल में भारतीयों के लिए सिविल सर्विस में जाना बहुत कठिन था, किंतु उन्होंने सिविल सर्विस की परीक्षा में चौथा स्थान प्राप्त किया।
पत्रकार राजेन्द्र राठौर ने कहा कि वर्ष 1921 में भारत में बढ़ती राजनीतिक गतिविधियों का समाचार पाकर नेताजी ने अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली और शीघ्र भारत लौट आए। सिविल सर्विस छोडऩे के बाद वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ जुड़ गए। महात्मा गांधी के अहिंसा के विचारों से नेताजी सहमत नहीं थे। वास्तव में महात्मा गांधी उदार दल का नेतृत्व करते थे। वहीं सुभाषचंद्र बोस जोशीले क्रांतिकारी दल के प्रिय थे। महात्मा गांधी और सुभाषचंद्र बोस के विचार भले ही भिन्न-भिन्न थे, लेकिन वे यह अच्छी तरह जानते थे कि महात्मा गांधी और उनका मकसद एक है यानी देश की आजादी। सबसे पहले गांधीजी को राष्ट्रपिता कहकर नेताजी ने ही संबोधित किया था। अंत में आभार प्रदर्शन पं. राघवेन्द्र पाठक ने किया।
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