पहरिया. देश दुनिया के जंगलों से लगातार वृक्ष कम होते जा रहे हैं, जहां जंगलों की जगह अब बसाहट होने लगी है और पर्यावरण की रीढ़ माने जाने वाले पेड़ पौधे कटते जा रहे हैं। वहीं पहरिया पाठ में एक ऐसा जंगल है, जहां की लकड़ियां काटने से पहले लोग हजार बार सोचते हैं, फिर भी उनकी हिम्मत साथ नहीं देती। यहां जंगल की पहरेदार हैं मां अन्नधरी देवी। जिसे इस क्षेत्र के लोग जंगल की देवी मानते हैं। यहां लकड़ियां काटना तो दूर लोग जमीन पर गिरी हुई लकड़ियों को भी अपने घर नहीं ले जाते। इस डर से कि कहीं मां अन्नधरी उन पर नाराज न हो जाए।
जिला मुख्यालय जांजगीर से 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित ग्राम पहरिया की
इसी वजह से आसपास के ग्रामीण जंगल से किसी भी हालत में लकड़ियां अपने
घर नहीं ले जाते और न ही किसी को बेच सकते। एक बार गांव के एक व्यक्ति ने
जंगल से लकड़िया काटकर उसे घर में उपयोग कर लिया। जिससे उस परिवार
पर
विपत्ति का पहाड़ टूट पड़ा। मां अन्नधरी दाई के कोप से उस परिवार के कई लोग
गंभीर बीमारी से पीड़ित हो गए तथा आर्थिक रूप से परेशान रहने लगे। कुछ दिनों
बाद बीमारी से उस ग्रामीण की भी मौत हो गई। बाद में परिजनों ने मां
अन्नधरी दाई के मंदिर में जाकर क्षमा याचना की पूजा पाठ किया, तब जाकर
परिवार को राहत मिली। इस तरह की कई घटनाएं होने के बाद ग्रामीणों को
विश्वास हो गया कि मां अन्नधरी स्वयं जंगल की पहरेदारी करती हैं। मां के
प्रभाव से ही पहरिया जंगल आज भी हरियाली से लबरेज है। जहां पर्यावरण को
नुकसान पहुंचाने वाले हर गांव, शहर में बढ़ते जा रहे हैं, वहीं यहां के जंगल
में एक भी लकड़ी काटने के लिए कोई तैयार नहीं होता। इससे पर्यावरण का
संरक्षण भी हो रहा है और मां अन्नधरी के प्रति लोगों की आस्था बनी हुई है।
पर
विपत्ति का पहाड़ टूट पड़ा। मां अन्नधरी दाई के कोप से उस परिवार के कई लोग
गंभीर बीमारी से पीड़ित हो गए तथा आर्थिक रूप से परेशान रहने लगे। कुछ दिनों
बाद बीमारी से उस ग्रामीण की भी मौत हो गई। बाद में परिजनों ने मां
अन्नधरी दाई के मंदिर में जाकर क्षमा याचना की पूजा पाठ किया, तब जाकर
परिवार को राहत मिली। इस तरह की कई घटनाएं होने के बाद ग्रामीणों को
विश्वास हो गया कि मां अन्नधरी स्वयं जंगल की पहरेदारी करती हैं। मां के
प्रभाव से ही पहरिया जंगल आज भी हरियाली से लबरेज है। जहां पर्यावरण को
नुकसान पहुंचाने वाले हर गांव, शहर में बढ़ते जा रहे हैं, वहीं यहां के जंगल
में एक भी लकड़ी काटने के लिए कोई तैयार नहीं होता। इससे पर्यावरण का
संरक्षण भी हो रहा है और मां अन्नधरी के प्रति लोगों की आस्था बनी हुई है।
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