राजेन्द्र जायसवाल@चांपा. लोक निर्माण विभाग इन दिनों भ्रष्टाचार का गढ़ बना हुआ है। इस विभाग में पदस्थ भ्रष्ट अधिकारियों, नौकरशाहों, राजनेताओं और ठेकेदारों ने आपस में मिलीभगत कर सरकार को कुछ वर्षों के भीतर करोड़ों का चपत लगाया है। सरकार को यह चपत पूर्ण हो चुकी सडक़ें, पुल-पुलियों के साथ ही निर्माणाधीन सडक़ों और पुल-पुलियों के घटिया निर्माण, टेंडर में गड़बड़ी, पुरानी सडक़ों पर पुन: निर्माण, पुल-पुलिया का मापदंड को दरकिनार कर बनाने, समय पर निर्माण नहीं होने से लागत बढऩे के साथ ही भ्रष्टाचार से लगाई गई है। लोक निर्माण विभाग में भ्रष्टाचार की जड़ें किस तरह फैली हैं, इसका खुलासा प्रदेश के अन्य जिलों में पदस्थ अफसरों व कर्मचारियों पर छापामार कार्रवाई से हो रहा है। इसके बावजूद जिले में पदस्थ विभाग के जिम्मेदारों के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही है।
उल्लेखनीय है कि लोक निर्माण विभाग शासकीय भवनों, मार्गों तथा पुलों के सर्वेक्षण, रूपांकन, निर्माण एवं रखरखाव आदि सभी कार्यों को करवाने वाला प्रमुख विभाग है। इतनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी वाले इस विभाग को हर साल राज्य सरकार द्वारा करोड़ों रुपए का बजट मुहैया कराया जाता है, लेकिन इतना बड़ा बजट मिलने के बाद भी विभाग गुणवत्ता पूर्ण कार्य करने में असफल साबित हुआ है। विभाग में भर्राशाही और भ्रष्टाचार किस कदर हावी है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि विभाग ने अब तक दर्जनों ठेकदारों को ब्लैक लिस्टेड कर रखा है। लोक निर्माण विभाग ने प्रदेश में भ्रष्टाचार को बुनियादी स्तर पर सचमुच नए सिरे से परिभाषित किया है। अन्य विभागों के विपरीत, जहां रिश्वत, काम की रफ्तार को तेज करने का काम करता है, वहीं लोक निर्माण विभाग में इसकी भूमिका बदल जाती है। यह संभवत: उन चंद विभागों में से है, जहां, अधिकारी घटिया सेवाएं देने के लिए पैसे लेते हैं। यहां भ्रष्टाचार का पूरे समाज पर व्यापक असर पड़ता है। सडक़ों के रखरखाव और जल निकासी की व्यवस्था के लिए काफी हद तक लोक निर्माण विभाग ही जिम्मेदार होता है। कोई भी साल ऐसा नहीं होता है, जब भारी बारिश के बाद जिले के ज्यादातर शहरों में जिंदगी ठहर सी न जाती हो। हर साल जिले भर में बारिश के बाद न केवल सडक़ें बर्बाद हो जाती हैं, बल्कि नाले-नालियां भी उफनाने लगते हैं। लोक निर्माण विभाग मरम्मत का जो भी काम कराता है, वह चंद महीनों में ही बराबर हो जाता है। अगली बारिश में ही पता चल जाता है कि दरअसल क्या काम कराया गया था। नतीजा यातायात में रुकावट, सार्वजनिक जीवन में बाधाएं, सामग्री का नुकसान और बड़े पैमाने पर महामारी का प्रकोप। जिले में हर साल सडक़ की वजह से सरकार को करोड़ों रुपए का खामियाजा उठाना पड़ता है। जिले में सडक़ माफिया, पीडब्ल्यूडी के कर्मचारियों, स्थानीय राजनेताओं और ठेकेदारों का गठजोड़ इस हद तक पहुंच गया है कि किसी भी ईमानदार आदमी की प्रतिबद्धता खतरे में पड़ गई है। लोक निर्माण विभाग कई बार निजी कंपनियों के जरिए निर्माण कार्य करवाता है और विभाग की नाक के नीचे और दोनों की सुविधा के अनुसारए सडक़ों, पुलों और बुनियादी सुविधाओं के निर्माण में धड़ल्ले से घटिया सामग्री का इस्तेमाल होता है। इसका परिणाम यह होता है कि हर साल करोड़ों रूपए खर्च करने के बाद भी जिले की सडक़े बदहाल हैं। पिछले एक दशक में लोक निर्माण विभाग ने सैकड़ों सडक़ों का निर्माण करवाया है, लेकिन भ्रष्टाचार के कारण ये सडक़ें ऐसी बनी हैं कि कईयों का अस्तित्व केवल कागजों पर है। रिश्वतखोरों का स्वर्ग लोक निर्माण विभाग में रिश्वत नारियल जैसा हो गया है, जो हर काम से पहले चढ़ाना ही पड़ता है। सही कहा जाए तो लोक निर्माण विभाग के ज्यादातर अधिकारी भ्रष्ट हैं और नौकरशाहों और राजनेताओं से माफिया की मिलीभगत इस समस्या को और गंभीर बना रही है।
सर्वाधिक भ्रष्टाचार सडक़ निर्माण में
सडक़ निर्माण को शायद सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार वाले क्षेत्र के तौर पर देखा जाता है। यही वजह है कि सडक़ निर्माण में गुणवत्ता को लेकर हमेशा संशय बना रहता है। यह आम है कि भारी राशि खर्च करके कोई सडक़ तैयार की जाती है और बारिश या वाहनों के दबाव से कुछ ही समय बाद उसके टूटने की खबर आ जाती है। शायद इसी के मद्देनजर ग्रामीण विकास योजनाओं की प्रगति की समीक्षा करते हुए प्रधानमंत्री ग्रामीण सडक़ योजना के तहत बनाई जा रही सडक़ों की गुणवत्ता की सख्त निगरानी सुनिश्चित करने के लिए प्रधानमंत्री ने एक प्रभावशाली तंत्र स्थापित करने का निर्देश दिया है। यह छिपी बात नहीं है कि सडक़ निर्माण की निविदा निकलने से लेकर सामग्री की खरीदी, निर्माण और रखरखाव तक भारी पैमाने पर भ्रष्टाचार पसरा हुआ है। पिछले आठ-दस सालों के दौरान जिले भर में सडक़ों का जाल बिछाने की कोशिश की गई। बहुत सारे दूरदराज के इलाकों को मुख्य सडक़ों से जोड़ा गया। खासकर, जब से प्रधानमंत्री सडक़ निर्माण योजना की शुरुआत हुई, उसके बाद इस क्षेत्र में बड़ी कामयाबी हासिल हुई, लेकिन सवाल है कि इतने बड़े पैमाने पर सडक़ निर्माण के साथ क्या गुणवत्ता का भी खयाल रखा गया, इसका अंदाजा सिर्फ इसी से लगाया जा सकता है कि कई जगहों पर महज दो-तीन साल पहले बनी हुई सडक़ों को भी आज इस कदर दुर्दशा में देखा जा सकता है कि उस पर सहज तरीके से वाहन न चल पाएं।
निर्माण के साथ ही धंसकने लगी सडक़ें
जब जिला मुख्यालय जांजगीर और चांपा में सडक़ें धंसकने से लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है तो दूरदराज के इलाकों की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। ऐसा इसलिए संभव होता है कि किसी खास दूरी में सडक़ निर्माण के लिए सब कुछ नाप-तौल कर बजट बनाया जाता है। मानक तय किए जाते हैं और राशि जारी की जाती है, लेकिन संबंधित महकमे के अधिकारियों से लेकर निचले स्तर के ठेकेदार तक भ्रष्ट तरीके से इसी राशि में से हिस्सा बंटाने के फेर में इस बात का ख्याल रखना जरूरी नहीं समझते कि इसका सडक़ की गुणवत्ता पर क्या असर पड़ेगा। बचे हुए पैसे में काम पूरा करने की कोशिश का नतीजा यह होता है कि जिस सडक़ को बनाने में जितनी और जिस स्तर की सामग्री का उपयोग होना चाहिए, उसमें कभी मामूली तो कभी ज्यादा कटौती कर दी जाती है। ऐसा शायद इसलिए हो पाता है कि राशि जारी करने से लेकर निर्माण की समूची प्रक्रिया के पूरा होने और फिर देखरेख पर निगरानी तंत्र की जवाबदेही सुनिश्चित नहीं है। ग्रामीण इलाकों में साधारण लोगों के बीच इस बात को लेकर जागरूकता कम है कि उनके उपयोग के लिए जो सडक़ बनाई जा रही है, अगर वह तय मानकों के हिसाब से नहीं बनी है तो वे शिकायत करें।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें