जांजगीर-चांपा. धनतेरस पर इस बार जिले के बाजारों में कम रौनक दिख रही है, क्योंकि जीएसटी की मार ने लोगों का पूरा बजट गड़बड़ा दिया है। जीएसटी की मार से व्यापारी वर्ग भी परेशान हैं। नोटबंदी के बाद पडऩे वाली पहली दीवाली व्यापारियों के लिए निराशाजनक साबित हो रही है।
दरअसल, धनतेरस पर्व दीवाली से पहले मनाया जाने वाला त्योहार है। यह पर्व पूरे देश में धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन मां लक्ष्मी की पूजा की जाती है, ताकि उनकी कृपा हमेशा परिवार पर बनी रहे। इस दिन नए बर्तन और नए गहने खरीदे जाते हैं। इस दिन खरीदारी करना शुभ माना जाता है, इसलिए लोग बाजार जाकर गहने और नए बर्तन खरीदते हैं, लेकिन जीएसटी ने लोगों का पूरा बजट गड़बड़वा दिया है। यहां बताना लाजिमी होगा कि किसी भी त्योहार की बात करें तो जीएसटी का असर सब पर हुआ है। धनतेरस का त्योहार भी जीएसटी के प्रभाव से अछूता नहीं रहा है। जिले के निम्न और मध्यमवर्गीय परिवार के लोग बजट देखकर धनतेरस के लिए खरीदारी कर रहे हैं। यही वजह है कि इस बार बाजारों में रौनक कम देखने को मिल रही है। लोगों का कहना है कि पिछले साल के मुकाबले वो बजट को ध्यान में रखते हुए खरीदारी कर रहे हैं। जीएसटी के कारण त्योहारों का मजा भी कम हो गया है। लोग सोच-समझ कर सामान खरीद रहे हैं। धनतेरस पर ज्यादातर लोग कांसे के बर्तन खरीदते हैं, क्योंकि कांसा को शुभ माना जाता है। जिले में भी लोग अधिकतर कांसे के बर्तन खरीद रहे है। दुकानदारों का कहना है कि त्योहारों में पिछले साल तक लोगों की भीड़ दुकानों पर होती थी, लेकिन इस बार दुकानदारों का करीब 40 प्रतिशत काम प्रभावित हुआ है। वहीं गहनों की खरीद कम होने से सराफा व्यवसायियों का काम 30 प्रतिशत तक कम हुआ है। व्यवसायियों का कहना है कि इस बार ग्राहक कम आ रहे हैं। वे कहते हैं कि बीते साल के मुकाबले कम लोग सोना खरीदने आ रहे हैं। नोटबंदी के बाद जीएसटी लागू होने से लोगों का बजट गड़बड़ा गया है।
धनतेरस के महत्व और पूजा का मुहूर्त
धनतेरस हिंदू परिवारों के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि धनतेरस के शुभ दिन पर लोग नए बर्तन, सोना-चांदी खरीदना शुभ मनाते हैं। ऐसा इसलिए किया जाता है, क्योंकि यह कहा जाता है कि देवी लक्ष्मी खुश होकर परिवारों पर धन की वर्षा करती हैं। वास्तव में धनतेरस पर पूजा न केवल देवी लक्ष्मी के लिए की जाती है, बल्कि कुबेर के लिए भी यह पूजा की जाती है, जो धन के देवता हैं। धनतेरस पर कई परिवारों में देवी लक्ष्मी और भगवान कुबेर दोनों की पूजा की जाती है, क्योंकि यह भगवान से मांगी प्रार्थनाओं के लाभ को दोगुना कर देता है। ज्योतिषाचार्यों के मुताबिक, इस बार धनतेरस पर पूजा का समय शाम 7.32 से रात 20.18 बजे तक है। वहीं प्रदोष काल शाम 5.49 बजे से रात 8.18 बजे तक है। वृषभ काल शाम 7.32 से रात 8.33 बजे तक है। इसी तरह 17 अक्टूबर को त्रयोदशी तिथि सुबह 12 बजकर 26 मिनट पर शुरू होगी। वहीं 18 अक्टूबर को त्रयोदशी तिथि सुबह 8 बजे समाप्त होगी। सूर्योदय के बाद शुरू होने वाले प्रदोषकाल के दौरान लक्ष्मी पूजा की जानी चाहिए।
भूलकर भी इस दिन न खरीदें ये 4 चीजें
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, धनतेरस के अवसर पर हर व्यक्ति कुछ न कुछ नई चीज जरूर खरीदता है। माना जाता है कि इस दिन नई चीज खरीदने से पूरे वर्ष घर धन-धान्य से भरा रहता है। कई लोग इस दिन बड़ी खरीदारी करते हैं तो कुछ लोग एक चम्मच लेकर भी इस परंपरा को पूरा करते हैं, लेकिन इस दिन कुछ न कुछ खरीदने के चक्कर में भूलकर ऐसी चीज न खरीद लें, जो अशुभ होता है। ऐसी 4 चीजें हैं, जिस धनतेरस पर नहीं खरीदना चाहिए। इस दिन कांच का सामना खरीदने से बचना चाहिए। क्रॉकरी आदि कुछ भी इस दिन न खरीदें। कांच से बनीं चीजें राहु से संबंधित होती है। अगर फिर भी आपके लिए कांच का सामान जरूरी है तो ध्यान रखें कि सामान बिल्कुल पारदर्शी हो। इसी तरह एल्युमनियिम के बर्तन न खरीदें। राहु से संबंधति वस्तु होने के कारण इनकी भी खरीदारी करने से बचें। चाकू, कैंची, छुरी और लोहे के बर्तन इस दिन तो बिल्कुल भी न खरीदें। सोने के आभूषणों की बजाय इस दिन हीरे और चांदी के आभूषण खरीदना अधिक शुभ रहेगा।
पूजा की समाग्री और पूजन विधि
पंडितों के अनुसार, धनतेरस के दिन धन के देवता कुबेर और सेहत की रक्षा और आरोग्य के लिए धन्वन्तरी देव की उपासना की जाती है। इस दिन यमराज की भी पूजा होती है। पूरे साल में यह अकेला ऐसा दिन है, जिस दिन यमराज की पूजा की जाती है और अकाल मृत्यु से रक्षा की कामना की जाती है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन विशेष विधि से धनतेरस की पूजा करने वाले लोगों को जीवनभर धन की कमी नहीं होती और मान व सम्मान बना रहता है। पंडितों ने बताया कि पूजा के लिए 21 पूरे कमल बीज, मणि पत्थर के 5 प्रकार, 5 सुपारी, लक्ष्मी/गणेश के सिक्के (10 ग्राम या अधिक), अगरबत्ती, चूड़ी, तुलसी पत्र, पान, चंदन, लौंग, नारियल, सिक्के, काजल, दहीशरीफा, धूप, फूल, चावल, रोली, गंगा जल, माला, हल्दी, शहद, कपूर आदि की आवश्यकता पड़ती है। पूजन विधि के संबंध में उन्होंने बताया कि संध्याकाल में उत्तर की ओर कुबेर तथा धन्वन्तरी की स्थापना करें। दोनों के सामने एक-एक मुख का घी का दीपक जलाएं। कुबेर को सफेद मिठाई और धन्वन्तरि को पीली मिठाई चढ़ाएं। पहले ‘ऊं ह्रीं कुबेराय नम:’ का जाप करें। फिर ‘धन्वन्तरि स्तोत्र’ का पाठ करें। धन्वान्तारी पूजा के बाद भगवान गणेश और माता लक्ष्मी की पंचोपचार पूजा करना अनिवार्य है। भगवान गणेश और माता लक्ष्मी के लिए मिट्टी के दीप जलाएं। धूप जलाकर उनकी पूजा करें। भगवान गणेश और माता लक्ष्मी के चरणों में फूल चढ़ाएं और मिठाई का भोग लगाएं। इसके बाद प्रसाद ग्रहण करें। पूजा के बाद दीपावली पर कुबेर को धन स्थान पर और धन्वन्तरि को पूजा स्थान पर स्थापित करें।

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