सोमवार, 20 मार्च 2017

मड़वा-तेंदूभाठा ताप विद्युत परियोजना में फिर आई तकनीकी खराबी, उत्पादन ठप

जांजगीर-चांपा. एक साल से खराब पड़ी मड़वा प्रोजेक्ट की 500 मेगावाट की इकाई दो दिन चलने के बाद तकनीकी दिक्कतों की वजह से फिर बंद हो गई है। हरिद्वार से टरबाइन आने में लंबा वक्त लगा। किसी तरह नया टरबाइन लगाकर दो दिन पहले ही यूनिट को प्रारंभ किया गया था। 250 मेगावाट तक यूनिट चली और फिर रविवार की शाम ट्रिप कर गई, जिससे विद्युत उत्पादन प्रभावित हो गया है।


छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत उत्पादन कंपनी के मड़वा-तेंदूभाठा ताप विद्युत परियोजना से काले बादल हटने का नाम नहीं ले रहे हैं। पिछले वर्ष मार्च 2016 के अंतिम सप्ताह में एक नंबर यूनिट (500 मेगावाट) को सिंक्रोनाइजेशन कर लोड में लिया गया था। इकाई चालू होने के साथ ही कंपनी ने कामर्शियल लोड में लेने की घोषणा कर दी। इकाई 500 मेगावाट फुल लोड़ पर एक सप्ताह भी नहीं चल पाई कि उसमें पहले राख भरने, फिर टरबाइन में खराबी आने की समस्या सामने आ गई। स्थिति यह रही कि विद्युत कंपनी को टरबाइन बीएचईएल से मंगाना पड़ गया। आठ माह बाद जनवरी में पहुंच टरबाइन को लगाने में ही डेढ़ माह का वक्त लग गया। बीते रविवार को इकाई को परिचालन में लिया गया था, लेकिन चंद घंटे बाद ही 120 मेगावाट की लोड में आते हुए यूनिट के जनरेटर ट्रांसफार्मर में खराबी आ गई। इसके साथ ही इकाई बंद हो गई। सुधार कार्य एवं ऑयल मंगाने के बाद गुरूवार लाइटअप किया गया। बार-बार बंद हो रही इकाई को कंपनी के अफसर समझ नहीं पा रहे हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार, रविवार शाम 6 बजे तक इकाई तकनीकी खराबी आने ट्रिप होकर बंद हो गई। आश्चर्य की बात यह है कि इकाई अभी तक 250 मेगावाट से ऊपर नहीं चल पाई है, जबकि इकाई को पांच सौ मेगावाट चलाना है। यही स्थिति दो नंबर इकाई की बनी हुई है। दूसरी इकाई अब तक अधिकतम 475 मेगावाट तक पहुंच सकी है। यूनिट में बार-बार आ रही खराबी से कंपनी के अफसरों की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान खड़ा हो गया है।

 अब तक 5500 करोड़ का नुकसान

मड़वा-तेंदूभाठा ताप विद्युत परियोजना के निर्माण कार्य में तीन वर्ष से भी अधिक विलंब हो चुका है। इसके बाद भी यूनिट नहीं चल पा रही है। यदि उत्पादन हानि देखा जाए तो अब तक 5500 करोड़ से भी अधिक नुकसान हो चुका है। इसके अलावा अन्य प्रकार की हानि भी कंपनी को उठानी पड़ रही है। जानकारों का कहना है कि संयंत्र की लागत बढ़ कर 9 हजार करोड़ से भी अधिक हो चुकी है।

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