रविवार, 16 जुलाई 2017

पेड़ नहीं बन सके वीवीआईपी के हाथों लगवाए गए पौधे, जिले भर में वृहद रूप से रोपे गए पौधों का नामोनिशान तक नहीं

राजेन्द्र राठौर @ जांजगीर-चांपा. जिले भर में वृहद अभियान के रूप में दो-तीन वर्षों के भीतर रोपे गए पौधों का नामोनिशान नहीं है। देखरेख में लाखों रुपए फूंकने के बाद भी वीवीआईपी के हाथों लगवाए गए पौधे पेड़ नहीं बन सके। ज्यादातर पौधे सूखकर मर चुके हैं। वहीं सुरक्षा घेरा नहीं होने के कारण कई पौधे जानवर चर गए। सरकार एक बार फिर इसी तरह का अभियान चलाकर पौधे रोपने की तैयारी में है। वन विभाग ने जिले में इस बार भी लाखों की संख्या में पौधे रोपने का लक्ष्य रखा है। 

जिला मुख्यालय जांजगीर स्थित कलेक्टोरेट परिसर, जिला अस्पताल रोड सहित विभिन्न स्थानों पर रोपे गए पौधों का अस्तित्व नहीं है। इसी तरह चांपा, अकलतरा व सक्ती के विभिन्न स्थानों पर रोपे गए पौधे पेड़ नहीं बन सके। इन पौधों को जिले के प्रभारी मंत्री अमर अग्रवाल, सांसद कमला पाटले, संसदीय सचिव अंबेश जांगड़े, तत्कालीन कमिश्नर सोनमणि बोरा तथा निहारिका बारिक सिंह, कलेक्टर डॉ. एस भारतीदासन, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अजय यादव, जिला वन मंडलाधिकारी सतोविशा समाजदार समेत जिले के तमाम प्रमुख जनप्रतिनिधियों तथा अफसरों के हाथों रोपित कराए गए थे। इस बार भी जनप्रतिनिधियों तथा अफसरों के हाथों पौधे लगवाकर अभियान शुरू किया जाएगा। इसके लिए मनरेगा और कैंपा जैसी योजनाओं से वन विभाग को भारी भरकम बजट मिला है।
 

वन विभाग नहीं करता देखरेख

सडक़ों के चौड़ीकरण के दौरान काटे जाने वाले पेड़ों के बदले बड़ी संख्या में पौधे रोपे जाने का प्रावधान हैं। जिले के विभिन्न मार्गों पर ऐसे हजारों पौधे लगाए गए थे। सुरक्षा घेरा भी किया गया था, लेकिन देखरेख के अभाव में पहले सुरक्षा घेरा टूटा और बाद में जानवरों का चारा बन गया। इतना ही नहीं, गर्मी के दिनों में ऐसे पौधों को झुलसने से बचाने वन विभाग की ओर से कोई उपाय नहीं किए जा सके। इसका नतीजा अभियान की असफलता के रूप में सामने आया।
 

सामाजिक सहभागिता जरूरी

रोपे गए पौधों को पेड़ बनाने के लिए सरकारी अभियान की अपेक्षा सामाजिक सहभागिता अहम साबित हो सकती है। इससे आम लोगों का जुड़ाव होगा और सरकार की मंशा भी सफल होगी। यह कहना है पर्यावरणविद अधिवक्ता विजय दुबे का। उनके अनुसार, पौधे रोपे जाने से पहले समाज, संस्था या संगठनों को जिम्मेदारी के साथ इससे जोड़ा जाए, ताकि शुरुआत से ही जिम्मेदारी तय की जा सके, तभी पर्यावरण संरक्षण को लेकर किया गया काम सफल हो सकेगा।

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